,

संस्थापक एवं आधारस्तंभ

संस्थापक एवं आधारस्तंभ

संस्था के महान आध्यात्मिक व्यक्तित्व; जिन्होंने स्वपरिवर्तन के माध्यम से आध्यात्मिक युग की नींव रखी और आत्म परिवर्तन द्वारा विश्व परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध इस असाधारण यज्ञ के प्रेरणास्रोत बने।

परमपिता परमात्मा – संस्थापक

परमात्माकहतेहैंमीठेबच्चोंमेरादिव्यऔरसार्थकनाम ‘शिव‘ है।ऐसाइसलिएक्योंकिमैंसभीकाभलाकरताहूं।मैंसबसेअधिकपरोपकारीहूंऔरमेरेकर्तव्योंकासमस्तमानवजातिपरकल्याणकारीप्रभावपड़ताहै।

मीठे बच्चों, मैं स्वयं प्रकाशमय हूँ और सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तुओं से भी अधिक सूक्ष्म हूँ। जैसे आप सभी मनुष्य आत्माएँ स्वयं-प्रकाशित, अनादि सत्ताएँ हैं, वैसे ही मैं भी स्वयं-प्रकाशित, तेजोमय बिन्दु स्वरूप हूँ। जिस प्रकार आकाश में एक तारा चमकीले बिंदु समान प्रतीत होता है, उसी प्रकार मनुष्य आत्मा भी वास्तव में विवेकशील प्रकाश का एक बिंदु मात्र है जो मनुष्य के भौतिक शरीर में मस्तक के बीचों बीच स्थित रहती है। परंतु मैं परमात्मा; पवित्रता, शांति, आनंद, प्रकाश, ज्ञान और गुणों में सर्वश्रेष्ठ हूं। मैं आप सभी आत्माओं से इसलिए अलग हूं क्योंकि मैं जन्म और मृत्यु से परे हूँ। आप सभी मनुष्य आत्माएं सुख-दुःख के चक्र में बँधे हुए हैं, लेकिन मैं सदैव ही उससे बाहर हूँ। आपके जन्म और मृत्यु के चक्र में आते आते और आपके द्वारा की गई गलतियों वा पाप से आपकी ऊर्जा का ह्रास होता है। जबकि मैं शिव, सर्वोच्च सत्ता जन्म और मृत्यु के चक्र से पूरी तरह परे हूं और इसलिए मैं शाश्वत रूप से निष्कलंक और ज्ञान का सागर हूं और किसी भी पाप से अछूता हूं। इस सृष्टि पर जब धर्म का पूर्णतयः नाश हो जाता है तभी मैं इस नश्वर लोक पर अवतरित होता हूँ। मैं अपने घर, आत्माओं की दुनिया (परम धाम) से मनुष्य के शरीर-रूपी रथ में अवतरित होता हूं क्योंकि मुझे ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग के मार्ग को आप बच्चों को समझाने के लिए मनुष्य के मुख की आवश्यकता होती है ताकि पवित्रता, धार्मिकता की नई व्यवस्था या ‘स्वर्ण युग’ अर्थात सतयुग को फिर से स्थापित किया जा सके। इस प्रकार से, किसी मनुष्य के शरीर में अस्थाई रूप से प्रवेश करके ज्ञान का उच्चारण करना ही मेरा अलौकिक दिव्य जन्म है।

Lq bb 08

प्रजापिता ब्रह्मा : संस्थापक पिताश्री और परमात्म निमित्त

पिताश्री प्रजापिता ब्रह्मा; ब्रह्माकुमारीज़ के संस्थापक पिता हैं। वह वर्ष 1936 में संस्था की स्थापना के लिए सर्वशक्तिमान परमात्मा शिव के साधन बने। इससे पूर्व उन्हें “दादा लेखराज” के नाम से जानते थे। हालाँकि जन्म से वह साधारण व्यक्ति थे, फिर भी उनमें कई विशेष गुण थे, जिन्हें पहली नज़र में ही स्पष्टता से देखा जा सकता था। उनके व्यक्तित्व में एक रमणीय, अवर्णनीय आकर्षण, करिश्माई चमक थी। उनसे मिलने वाले व्यक्तियों को दूर से ही उनके स्वभाव में प्रेम, नम्रता अत्यन्त ईमानदारी महसूस होती थी। उनकी आँखें अविस्मरणीय, चुंबकीय आकर्षण और शक्तियों से भरपूर प्रतीत होती थीं। उनके रहन-सहन के तरीके, सज्जनतापूर्ण व्यवहार और ईश्वर के प्रति उनकी सच्ची भक्ति और निष्ठा की वजह से जो भी उनसे मिलता, उनका दोस्त वा प्रशंसक बन जाता था। उनके व्यक्तित्व में कोई भी दोष वा विकार नहीं था। उनके सभी गुण, आध्यात्मिक प्रवृत्ति और ईश्वरीय सेवा के प्रति उनके दृष्टिकोण और योगदान ने उन्हें इस ईश्वरीय कार्य के निमित्त बना दिया।

Lq s 038

मम्मा : संस्था की प्रथम प्रशासनिक प्रमुख

मातेश्वरी सरस्वती अथवा मम्मा ब्रह्माकुमारीज़ की पहली प्रशासनिक प्रमुख थीं। संस्था की स्थापना के शुरुआती दौर में आईं मम्मा की उम्र मात्र 16 वर्ष थी। वह ईश्वरीय ज्ञान की पारखी थीं और बहुत ही गहराई से ज्ञान को समझकर आत्मसात करती थीं और दूसरों से बहुत सटीकता से वर्णन करती थीं, उनकी यह विशेषता उन्हें यज्ञ के बाकी सभी भाई बहनों से अलग करती थी। वे तीक्ष्ण बुद्धि की मालिक थीं, जिसे उन्होंने ईश्वर की सेवा में बहुत सुंदर रीति से उपयोग किया। उनके बचपन का नाम “राधे” था और शुरुआती दिनों में जब वे यज्ञ; जिसे “ओम मंडली” के नाम से जाना जाता था, से जुड़ीं तब उन्हें “ओम राधे” का नाम दिया गया। कहा जाता है कि, जिस क्षण उन्होंने पहली बार ईश्वरीय ज्ञान सुना, वह अभिभूत हो गई, उनका मन खुशी से नाचने लगा, और अंत तक ज्ञान के प्रति उनका प्यार कभी भी कम नहीं हुआ। इसके पश्चात, उन्हें इस दुनिया की सारी क्षणिक खुशियाँ बेमानी और अयोग्य लगने लगीं। इसलिए उन्होंने योगी जीवन अपनाने और खुद को आध्यात्मिक सेवा में समर्पित करने का निर्णय लिया। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से ईश्वर प्रति सेवा में समर्पित कर दिया और ईश्वरीय निर्देशों के हर शब्द का “सदा “हाँ जी” कहकर पालन किया। उनके संपूर्ण समर्पण की भावना द्वारा उनमें अति शीघ्र परिवर्तन आने लगा और जैसे-जैसे वर्ष बीतते गए उनका आध्यात्मिक नशा और अधिक गहरा होता गया।

आदि रत्न – निमित्त आत्माएं

किसी पेड़ की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, वह उतना ही मजबूत और टिकाऊ होता है। इसी प्रकार से किसी भी संगठन को संचालित करने वाले व्यक्तियों के “त्याग और तपस्या” की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, वह संगठन उतना ही अधिक शक्तिशाली, दीर्घायु और बाधा रहित होता है। इस प्रकार से “प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय” एक अद्वितीय संस्था है। इस संगठन के सभी “आदि रत्न” वा संस्थापक सदस्य ऐसे महान तपस्वी और निष्ठावान थे, जिन्होंने स्वयं के गुप्त बलिदान द्वारा अथक और निस्वार्थ सेवाभाव से सर्वशक्तिमान परमात्मा के मार्गदर्शन के अनुसार; संपूर्ण मानवता के लिए अपनी आध्यात्मिक सेवाएं प्रदान की।

Dadi janki ji portrait 39 e1633512150246

Dadi Janki

Dadi gulzar ji e1633512398452

Dadi Gulzar

Dadi prakashmani ji face 16 e1633512632427

Dadi Prakashmani

Didi manmohini ji e1633513151341

Didi Manmohini

Dadi nirmal shanta ji ind 004 e1633513299705

Dadi Nirmalshanta

Dadi brijendra ji e1633513436149

Dadi Brij Indra

Dadi ratanmohini ji passport size photo 2 e1633513980741

Dadi Ratan Mohini

Dadi shantamani ji

Dadi Shantamani

Dadi manohar indra

Dadi Manohar Indra

Dadi hriday pushpa ji

Dadi Hridaypushpa

Dadi gange ji

Dadi Gange

Dadi all rounder

Dadi Allrounder

Dadi ishu pic 01

Dadi Ishu

Dadi pushpashanta 2

Dadi Pushpashanta

Dadi santr2i

Dadi Santri

Dadi sheelindra

Dadi Sheelindra

Dadi dhyani

Dadi Dhyaani

Dadi sandeshi ji

Dadi Sandeshi

Dadi kuj

Dadi Kunj

Dada vishwa kishore

Dada Vishwakishore

Dada anand kishor

Dada Anand Kishore

Tags

About Author

दिव्य प्रकाश सरोवर

ब्रह्माकुमारीज़ दिव्य प्रकाश सरोवर प्रशिक्षण केंद्र, महाराष्ट्र में जलगाँव स्थित अपने प्रकार का पहला बहु-आयामी प्रशिक्षण केंद्र है, जो देश के मध्य भाग में स्थित है। यह आत्मचिंतन और आत्मविकास का एक ऐसा स्थान है, जो हजारों लोगों की आत्मा को परमात्मा से शक्ति लेकर प्रफुल्लित करता है। परिसर का शांत वातावरण, सुंदर प्राकृतिक सज्जा और हरियाली आधुनिक जीवन की भागदौड़ से दूर होकर आंतरिक शांति और शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए एक आदर्श स्थल है।

Follow Us On Social Media

Editor’s Picks